Friday, 12 February 2016

सिर्फ एक शब्द भर गूंजता है
तमाम उदासियों से भरी
बिन बुहारी उजड़ी रातों से
इस रंगहीन सुबह तक.... !
तक़रीबन भुला चुके पतों से लौटे हुए
वो अधलिखे ख़त
उस जंग लगे संदूक की तलहटी में
बेआवाज़ बंद होना बेहतर समझते हैं
जिसके ताले की चाबियाँ भी अब अपनी खनक भूल चुकीं हैं ...
कितनी बार सुनूँ उस आसमानी फ़रिश्ते की
खोई हुई आवाज़ से खुद के नाम की पुकार ??
जो जमीं तक पहुँचने से पहले ही
हवा के रुख सा ,खुदबखुद बदल जाता है
और मैं खोजती रह जाती हूँ
उसमें तुम्हारे नाम का पहला अक्षर .... !
सुनूँ कैसे वो सब?
जो कहा ही नहीं गया
और जिसके मायने समझने से पहले ही
दुनिया भर के शब्दकोष रिक्त हो कर ,अपने होंठ भींचे
ख़ुदकुशी की शिलाओं तले दब गए !
सुकून सिर्फ आँखों में बसना नाकाफी होता है
जब ह्रदय में बहते लहू का सफ़र शिराओं से परे ,
शरीर के रोम कूपों तक भटक जाता है
और सांसों के थमने तक चुप्पी से गिरहबंदी कर लेता है ....
फिर भी -
कहना सुनना सहना
शब्द दर शब्द लिख पायेगा
तुमसे जुड़े अहसासों के होने  का अद्भुत इतिहास
जिसे बाँच कर आने वाले युग को समझ आएगा कि
मुक्ति एक शब्द भर नहीं है !!!!




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