Wednesday, 10 February 2016

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ना वो एक सुहानी शाम थी
ना समंदर का तूफानी किनारा
जेठ की तपती दोपहर  में
तुम्हारी आँखों की तपन से
झुलसती पिघलती मैं-
अब तक सिर्फ बहे जा रही हूँ .....

पीली कनेर सी मुस्कराहट
तुम्हारा हाथ थामते ही आग हो गयी थी
और धुआँ हो गए थे वो तीन शब्द
जो मेरी जुबां से तुम्हारे होठों तक
पहुंचे भी ना थे ...

याद है मेरा आँखें मूँद कर
खुद को तुम्हारे हवाले कर देना ?
ना जाने क्यूँ मेरा चेहरा
उगते सूरज सा हो गया था
और तुमने कहा था -
"देखो ,झील किनारे शाम उतर आयी है..."

जबसे तुमने मुझे कविता कहा
मैं बस कागज पर ही उतरती हूँ ।
तबसे अब  तक मेरा यूं ही बहते रहना
बेमकसद कभी नही रहा ...
इस बार देखना ...
झील में खारापन कितना बढ़ गया है !!!

- नीलम शर्मा

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