एक आवाज़ दो
कि खिल उठे शुष्क पीली पलकों की कोर
और गुनगुना मौसम
कालिख पुते अंधेरों के
अधर सहला के गा उठे।
एक नज़र डालो
कि सांसों में घुले नमक से फूँक दूँ
समन्दर की रगों में जान
और शैवाली लहरें फिसल कर
तलवों दबी रेत से इश्क़ कर बैठे।
एक दस्तक दो
कि पलट कर दहलीजों के सिरे खोल दूँ
और तुम्हारी ग़ज़ल पाँव में बाँध
तुम्हारे ही शहर का रास्ता पूछूँ।
या फिर-
कुछ न करो
और मुझे ही समझ लेने दो
कि बसंत आ रहा है
या बस अंत ...... !!!
कि खिल उठे शुष्क पीली पलकों की कोर
और गुनगुना मौसम
कालिख पुते अंधेरों के
अधर सहला के गा उठे।
एक नज़र डालो
कि सांसों में घुले नमक से फूँक दूँ
समन्दर की रगों में जान
और शैवाली लहरें फिसल कर
तलवों दबी रेत से इश्क़ कर बैठे।
एक दस्तक दो
कि पलट कर दहलीजों के सिरे खोल दूँ
और तुम्हारी ग़ज़ल पाँव में बाँध
तुम्हारे ही शहर का रास्ता पूछूँ।
या फिर-
कुछ न करो
और मुझे ही समझ लेने दो
कि बसंत आ रहा है
या बस अंत ...... !!!
No comments:
Post a Comment