Saturday, 5 March 2016

एक दर्द ,एक अहसास,एक राह 
परिंदे यूँ ही साथ उड़ कर नहीं आते मीलों दूर
भरोसा बाँधता भी है....!
बंधन सभी उलझते नहीं
कुछ खुल कर ज़्यादा दुखद हो जाते हैं।
देखना, पिछली बार की तरह इस बार भी
सफ़ेद उम्मीदों पे सतरंगी ख़्वाब बिखरेंगे
और फागुन आ कर जाने का नाम न लेगा
चाहे रंग कितने ही फीके क्यूँ ना पड़ जाएँ ....
तमाम गाँठों को खोलकर
उछाल देना आसमान की ओर
कोई न कोई परिंदा दबा ही लेगा अपनी चोंच में
और-
सुदूर बँट जायेगा हमारा साँझा अहसास
गोधूली के रंगों  के रूप में
बग़ैर अपना उजलापन खोए........!!


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