Monday, 4 January 2016

सुनो,
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
उन तमाम शहरों की धूल छान लेना
जहाँ डूबते सूरज को अर्क देने की प्रथा
सुहागिनों के चेहरों पर सौ -सौ चाँद उगा देती है।

हो सके तो उस दिशा में कुछ मंत्र  भी फूँक  देना
जहाँ यज्ञ के धुएँ को बारिश की बूँदों ने नहला दिया था
और आसमान हैरान हो कर
नारंगी से धूसर हो गया था।

इस बार अच्छी तरह परख लेना
चौराहे पे खड़ी मूर्तियों के चेहरों को ,
यकीनन उनकी पलकें बिना झपके
तुम्हारे ख्वाबों में तुम्हीं को बुनती हैं
फिर भी तुम राह भटक जाते हो।

प्रेम में होने की तुम्हारी अनगिनत शर्तें
गौ ग्रास की तरह, गंगा घाट पर प्रतीक्षारत
कागों को परोस देना -
देखना ,उस शाम की आरती में
सिर्फ उपालम्भों के दिये ही प्रवाहित होंगे।

और सुनो ...
ये सब ना हो सके तो
अबकी बार प्रेम में पड़ने से पहले
पिछले तमाम दिनों को रात में बदल कर
चाँद तारों को ओढ़ा देना
देखना -
अंधेरों से रौशनी का फर्क भूल गयी तुम्हारी आँखों से
मेरे नाम के सिवा कुछ और नहीं बरसेगा ....!!!


No comments:

Post a Comment