सुनो,गौर से सुनो
उसके क़दमों की आहट
चूड़ियों की खनक
और पायल की रुनझुन -
समझो, उसकी कनखियों के इशारे
चुप चुप से संवादों
और माथे की सलवटों के मायने -
अब भी लरजते हैं उसके आलता रचे पाँव
याद करके तुम्हारी हथेलियों की छुअन
ज़मीन और उसके तलवों के दरमियाँ -
कभी छिपकर देखना
उसकी मेहंदी के बूटों में
कहीं होगा तुम्हारे ही नाम का पहला अक्षर-
यह भी दोहरा लेना
कि आखिरी बार कब लाकर दिया था
उसे फूलों का गजरा?
हो सकता है उसके तकिये में
अब भी समाई हो मोगरे की महक...
तमाम छोटी बड़ी उलझनों के बीच
कब तुमने इसरार किया था
एक प्याला चाय साथ साथ पीने का?
मुमकिन है वो राह तक रही हो
तुम्हारी फुर्सत के चंद लम्हों की ,
जो जाने अनजाने तुम उसे छोड़
कितनों के नाम कर आये.....
ज़रा फिर से पकड़ो दायरों के उस सिरे को
जिनमें चक्कर लगा लगा कर
तुम डगमगाते क़दमों की शुरुआत ही भूल गए...
आवाज़ देकर तो देखो आज फिर से -
न लौट आयें तमाम मुश्किलों के हल
थाम कर उसकी उँगलियों की गिरफ्त ,
तो समझूंगी मेरी सोच को अब
तुम्हारे सहारे की ज़रुरत है......
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