Monday, 11 June 2012

मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती



आज फिर से उगी वही तमन्ना 
एक बूँद बनूँ और बरसूँ तुम्हारे शहर में ...
मिन्नतें करुँगी सूरज से 
इतना जलाये मुझे कि मैं बादल बन जाऊं ,
हवा से करुँगी गुज़ारिश 
कि सीधे ला पटके मुझे 
तुम्हारे शहर के आसमान में 
और बस -
मैं बरस पडूँ वहां ......
कोई फ़िक्र नहीं
 जो किसी नदी नाले में भटकती फिरूँ
हो सकता है पेड़ की फुनगी पे ही अटक जाऊं 
या फिर नुक्कड़ वाले नल से ही टपक पडूँ ....
चाहत ये नहीं कि तुम्हारे शहर की मिटटी में 
यूँ ही गुम हो जाना है मुझे ...!
ख्वाहिश तो यह जताने की है मेरी 
कि मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती......!!!

1 comment:

  1. वाह!!! शब्दों के छोटे से संसार में कितना बड़ा तूफान खड़ा कर दिया आपने....समय के पर भले लग जायें.....लेकिन मैं तुम्हे नहीं भूल सकती.

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