एक सोच-
कि तुम्हारा सब कुछ मेरा है-
अब नहीं रही...
गुज़र गई वह एक देह की तरह
मेरे जीवन की सीमाओं से परे ,
वक़्त की शाख से टूटते लम्हों की मानिंद
संवेदनाओं के आँचल की
फटी गांठ से टपकती
यहाँ -वहां ...
अब असंभव है उसे समेट कर
फिर से बांध लेना...
एक और सोच-
कि किसी को चाहो तो जिंदगी उसके नाम कर दो -
वह भी आज चल बसी ...
शोर मचाती रेल सी चाहत
अचानक खामोश पदचाप की तरह
मेरे बगल के दरवाजे पर
दस्तक देती रही ...
और मैं इंतजार करती रही
उसके मुड़ कर मेरे दरवाज़े तक आने का...
पर अब अपनी सोचों के देहावसान पर
दुखी नहीं होउंगी मैं -
अपना सा लगने लगा है मुझे
पीडाओं का चेहरा ...
और अच्छी लगती है अब
चोटों की मरहम से दुश्मनी ...
सुकून मिलने लगा है मुझे
उस कविता को लिख कर
जिसमें तुम्हारी मौजूदगी
अब कहीं नहीं है.....

No comments:
Post a Comment