Wednesday, 12 September 2012

अब तुम लौट जाओ


हाँ ,अब तुम लौट जाओ...
मेरे कोई भी शब्द ,अंक और रेखाएं 
अब तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेंगे 
मेरी हथेलियों में तुम्हारे नाम की कोई रेखा 
बनी ही नहीं ...
ना ही मेरे शब्दों को तुम्हारी धडकनों का 
संगीत ही मिला है...
मुझे बंद कमरों की कैद हमेशा से भाती है 
और तमाम सुबहों शामों से अपना नाम मिटा कर
उन्हें शहर से बाहर तक 
हाथ पकड़ कर छोड़ने की फ़िक्र मुझे होने लगी है.....!

सन्नाटे मुझे कभी डरावने नहीं लगे
और चुप्पियों से मेरा पुराना नाता रहा है.
हाँ,अब तुम लौट जाओ
इससे पहले कि
मायूसी में तब्दील होने लगी मेरी आवाज़ की सिहरन ,
तुम्हें इन्सान महसूस करने में नाकामयाब हो जाये
तुम लौट जाओ.....!!!

लेकिन मेरे लौटने पर 
ना कभी तुम्हारा वश था -ना रहेगा...
मेरे आंगन के गुलाब अब भी 
तुम्हारे सवालों के सही जवाब देते हैं
वो तमाम स्मृतियाँ पहले ही
मेरी उम्र के हर कोने में घर कर चुकी हैं
जिन्हें उखाड़ फैंकने की तुम्हारी हर कोशिश 
नाकाफी रही है .
मेरा लौटना तुम्हारी उम्मीदों से ज़रूर 
वादाखिलाफी करेगा 
क्यूंकि तुम्हें चोटों से जूझने का शौक है 
तो मेरी आँखों की नमी भी
 किसी गैर ज़रूरी मरहम को 
बेअसर करने का दम रखती है.....

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