ज़ख्मों का नासूर बन जाना मेरी उदासी की वज़ह कभी नहीं रहा ना ही मुस्कराहटों ने कभी शहर के मौसम बदले हैं ...उदासी या मुस्कराहटों का बेअसर हो जाना उन्हें औपचारिक नहीं बनाताबल्कि कोई इस तरह सेमेरे वजूद का एक हिस्सा बन जाता है...जोड़ रही हूँ उन हिस्सों को अपनी हथेलियों मेंतुम्हारा चेहरा बन जाने तक....
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