Wednesday, 12 September 2012


ज़ख्मों का नासूर बन जाना 
मेरी उदासी की वज़ह कभी नहीं रहा 
ना ही मुस्कराहटों ने 
कभी शहर के मौसम बदले हैं ...
उदासी या मुस्कराहटों का बेअसर हो जाना 
उन्हें औपचारिक नहीं बनाता
बल्कि कोई इस तरह से
मेरे वजूद का एक हिस्सा बन जाता है...
जोड़ रही हूँ उन हिस्सों को अपनी हथेलियों में
तुम्हारा चेहरा बन जाने तक....

No comments:

Post a Comment