Friday, 10 August 2012

चलते-चलते


चलते-चलते जब तुम्हारी
पगडंडियों के पांवों में 
छाले पड़ जाएँ -
तो उन्हें मेरी चौखट पे छोड़ जाना
मैं उन्हें धो पोंछ कर 
अपनी ताक में रख दूँगी 
कम से कमतर हो कर ,खो जाने वाले
पलों के बाद यकीनन तुम्हें
दोबारा मेरी तलाश होगी ही....
मैं अपनी पलकों को कस कर भींचना भी
तब बंद करुँगी 
जब हवा में बहती नमी से तुम्हें 
सिहरन होने लगेगी ...
जानते हो ,
उस दिन का अधूरा सफ़र 
अपने बाकी होने पर इतना खुश क्यूँ है?
क्यूंकि उसे पता है कि
अधूरे सिरे को वहीँ से जोड़ना
तुम्हारी आदत नहीं है...
तुम फिर चल कर शुरुआत तक पहुंचोगे
और उलटे पाँव चलते तुम्हारे कदम 
एक बार फिर थक कर 
मेरी ही चौखट पे साँस खीचेंगे.
तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद 
ये पग डंडियाँ  मेरी ताक से निकाल कर 
तुम्हारे तलवों के नीचे 
तब तक नहीं बिछेंगी,
जब तक मेरी पलकों का गीलापन 
तुम्हारे चेहरे की हर लकीर से मिल कर 
एक नए किस्से को अंजाम ना दे दे......

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