Saturday, 26 May 2012

उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है

 
उदासी आज फिर सिरहाने खड़ी है....
सवेरे बहुतेरी चिड़ियों को चुग्गा डाला
बगीचे का चक्कर भी लगा आयी 
तमाम मुरझाये फूलों से मुस्कराहट बांटी
सूरज से ओट भी की हथेलियाँ फैला कर 
मगर एक कोर भी न भीगी 
मोगरे की बिसूरती कली की- 
बस,यहीं से उदासी ने हाथ थाम लिया .....
      उनींदी दोपहर को फटकार लगाई 
     तो अचकचाकर उठ खड़ी हुई बेचारी  
     दो लोटे पानी पिलाया कचरा टटोलते भीखू को 
     और उलझती लटों की परवाह किये बगैर 
     धूल भरी बदली को बरसने का वादा याद दिलाया 
     मगर झट से नकार कर चलती बनी वह 
     बेगैरत कहीं की......!
    ज़रा सी राहत देना भी बर्दाश्त नहीं उसे 
    पेड़ों के तपते बदन को ...
रात से गुज़ारिश की ना बीतने की 
तो उसने माथे पे शिकन डाल 
चांदनी सूख जाने का बहाना बना डाला 
बस यूँ ही-
तमाम कोशिशें करती रही 
कि मन की आंच तुम तक ना पहुंचे 
फिर भी ना जाने क्यूँ 
उदासी आज सिरहाने खड़ी है .......! 

2 comments:

  1. jee han ,man kee udasi prakriti kee chhotee se chhotee ghatnaon se tartamya rakhtee hai . Pakriti aur man ke beech ka talmel ya santulan jara bhee gaddmadd hua nahi ki wah door tak antas ko bechain kar detee hain .Ees kavita se apkee gahree samvedansheelata prakat hotee hain Neelan jee ,Apne man kee vedna ko prakriti ke tatwon ke sath jod kar ek naya tadatmya sthapit kiya hai jo birle hee rachnakaron me darshit hota hai .ek uttam rachna ke liye meri badhayee sweekar karein Neelam jee .

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  2. बहुत ही सुंदर भाव संयोजन से सजी भावपूर्ण अभिव्यक्ति....

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