यूँ ही लिखते रहो तुम
बसंती से इस मौसम में
अपनी प्रेम कवितायेँ
जो शब्द छंदों की परिधि माने बगैर
डूबती उतरती रहती है
संबंधों की उन्मुक्त नदी में
तपा जाती हैं
देह और मन दोनों को ही
गुनगुनी धूप -सी
और बावरा सा मन
न जीता है न मरता ......
नन्हा सा सुख
स्मृतियों में भी छिपा होता है
जो हवा की गंध समेटे
उतर जाता है आत्मा तक
नदियों की धार पर
पक्षियों की चोंच सा
संगीत देता हुआ ......
तुम लिखते रहो यूँ ही
चाह कर भी न टूटेंगी कुछ खामोशियाँ
जो दबा रखी हैं उन तमाम मौसमों ने
अपनी कटोरा भर हँसी के बोझ तले
जो रह रह कर
जल तरंग सा बजा जाते हैं
बगैर ये जाने क़ि तुम उन्हें
अनुशासित करने की बात कहते हुए
भूल जाते हो उनमे पहले
जीवन फूंकना ......
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