Monday, 7 November 2011

यूँ ही लिखते रहो तुम


यूँ ही लिखते रहो तुम 
बसंती से इस मौसम में 
अपनी प्रेम कवितायेँ 
जो शब्द छंदों की परिधि माने बगैर 
डूबती उतरती रहती है 
संबंधों की उन्मुक्त नदी में 
तपा जाती हैं 
देह और मन दोनों को ही 
गुनगुनी धूप -सी 
और बावरा सा मन 
न जीता है न मरता ......
        नन्हा सा सुख 
       स्मृतियों में  भी छिपा होता है 
        जो हवा की गंध समेटे 
        उतर जाता है आत्मा तक
        नदियों की धार पर 
       पक्षियों की चोंच सा 
       संगीत देता हुआ ......
तुम लिखते रहो यूँ ही 
चाह कर भी न टूटेंगी कुछ खामोशियाँ 
जो दबा रखी हैं उन तमाम मौसमों ने 
अपनी कटोरा भर हँसी के बोझ तले
जो रह रह कर 
जल तरंग सा बजा जाते हैं 
बगैर ये जाने क़ि तुम उन्हें 
अनुशासित करने की बात कहते हुए 
भूल जाते हो उनमे पहले
जीवन फूंकना ......

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