Wednesday, 4 May 2011

तुम चले आये

जब भी तह करके
रखा स्मृतियों को
अपने वजूद के पिछले कोनो में/ सरकाकर
ये सोच कर कि
अब नहीं बिखरुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से -  आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रात भर करती रही/ ओस की  बूंदों से बातें
सुखाती रही
तकिये के किनारे का गीलापन / सुबह की किरणों से
ये सोच कर कि
अब नहीं बरसुंगी -तुम चले आये
मुस्कुराहटों से सजाये अँधेरे
खिलखिलाती रही दुपहरी
झिलमिलाती शामों के बिखरे से मंजर को संवारा
ये सोचकर कि
अब नहीं बहलुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
 अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये

3 comments:

  1. सुदंर रचना। बधाई के पात्र है।

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  2. ...वाह वाह

    वाह वाह.

    इसे दस-बीस बार कहा हुआ मानें.

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