जब भी तह करके
रखा स्मृतियों को
अपने वजूद के पिछले कोनो में/ सरकाकर
ये सोच कर कि
अब नहीं बिखरुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रात भर करती रही/ ओस की बूंदों से बातें
सुखाती रही
तकिये के किनारे का गीलापन / सुबह की किरणों से
ये सोच कर कि
अब नहीं बरसुंगी -तुम चले आये
मुस्कुराहटों से सजाये अँधेरे
खिलखिलाती रही दुपहरी
झिलमिलाती शामों के बिखरे से मंजर को संवारा
ये सोचकर कि
अब नहीं बहलुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रखा स्मृतियों को
अपने वजूद के पिछले कोनो में/ सरकाकर
ये सोच कर कि
अब नहीं बिखरुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये
रात भर करती रही/ ओस की बूंदों से बातें
सुखाती रही
तकिये के किनारे का गीलापन / सुबह की किरणों से
ये सोच कर कि
अब नहीं बरसुंगी -तुम चले आये
मुस्कुराहटों से सजाये अँधेरे
खिलखिलाती रही दुपहरी
झिलमिलाती शामों के बिखरे से मंजर को संवारा
ये सोचकर कि
अब नहीं बहलुंगी -तुम चले आये
बार- बार लगातार धकेलती रही
हथेलियों से - आँधियों को
पीछे की ओर
ये सोचकर कि
अब नहीं बहुंगी -तुम चले आये

सुदंर रचना। बधाई के पात्र है।
ReplyDeletethanx
ReplyDelete...वाह वाह
ReplyDeleteवाह वाह.
इसे दस-बीस बार कहा हुआ मानें.