बुनते ,उधेड़ते
उलझते ,सुलझते
बिखरते ,समेटते
यूँ ही गुजर जाता है
एक अहम् हिस्सा इस जीवन का
और रख देते हो तुम प्रेम को
एक पुराने कोट के मानिंद
टांग कर अलमारी में
सबसे पीछे
कि जब कभी जरुरत होगी
तो निकाल लेंगे
मैं फिर भी कास कर लपेट लेती हूँ
प्रेम कि उन बिखरी स्मृतियों को
अपने चारों ओर
एक गरम शाल की तरह
और अब मुझे इन्तजार है उस पल का
जब शरद झोंकों से सिहरने पर
याद तो आएगा तुम्हे वो पुराना गरम कोट
पर जहमत न होगी तुमसे उससे निकलने की
तब लपेट कर तुम्हे भी अपनी गरम शाल में
पूछूंगी ये प्रश्न
क्या प्रेम की परिभाषा
बदल गयी थी?

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