वो एक शख्स
जो बाँटता है ज़माने भर को खुशियाँ
उसे अपने ज़ख्म गिनने का वक़्त नहीं …
उन दिनों बंद खिड़की को बेध कर
दो निगाहें चला करतीँ थीं उसकी पीठ तले
तब वक़्त नापने की फुर्सत कहाँ थी ?
अब -
प्रेम का विश्लेषण वो करे या मैं …
नतीज़ा ख़ुशी- ग़म से परे
उँगलियों के पोरों तलक ही
सिमट आया है बस ……!!!
जो बाँटता है ज़माने भर को खुशियाँ
उसे अपने ज़ख्म गिनने का वक़्त नहीं …
उन दिनों बंद खिड़की को बेध कर
दो निगाहें चला करतीँ थीं उसकी पीठ तले
तब वक़्त नापने की फुर्सत कहाँ थी ?
अब -
प्रेम का विश्लेषण वो करे या मैं …
नतीज़ा ख़ुशी- ग़म से परे
उँगलियों के पोरों तलक ही
सिमट आया है बस ……!!!
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