Sunday, 29 December 2013

जब भी तुम्हारी आवाज़ का सहारा लेकर 
ख्वाबों को पर दिए हैं मैंने 
कहीं कुछ टूट कर ,
बार बार जुड़ा है ...
त्वचा के छिद्रों से लगातार रिसते दर्द 
हवा की नमी में घुल मिल गए 
और प्रेम का आकार 
सावन के बादलों सा बढ़ता गया ....
कुछ घुटन भरी सांसें 
ताज़ा दम होकर 
छितरा गयी यहाँ वहाँ
और बनता गया धुंध का एक कारवाँ
तुम्हारे शहर तक ......!
यकीन मानो ,
प्रीत का सुलगना ,सिर्फ तपाता नहीं
ना ही घोलता है रोज़ कानों में
मीठे शब्दों का शहद ---
ना ही प्रेम एक खरोंच भर है
जो खीँच देता है लकीर
किसी की गर्दन के पीछे से
पीठ के आखिरी छोर तक .....
ये दर्द ,घुटन ,तपन और खरोंच--
मेरे शहर से तुम्हारे शहर तक
शामिल होने वाले
हर ख्वाब का
ताउम्र पीछा करते रहेंगे
और तमाम रास्ते मुड़ मुड़ कर
तुम्हारी आवाज़ के हुनर पे
हैरान होते रहेंगे ....!!!

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