Friday, 1 March 2013

इतिहास


ये सच है कि 
इतिहास बनाने से पहले 
पूरी शिद्दत से आज को जीना पड़ता है 
फिर भी आधे अधूरे ख्वाब समेटने में 
वक़्त तो लगता है ...
मैं नहीं जानती कुछ भी 
तय करना ,
शायद मुश्किल ही होता होगा 
उतना ही -
जितना काले सफ़ेद अक्षरों का 
किसी रंगीन तस्वीर में तब्दील होना .
क्यारी में खिलते गुलाब और
गमले में उगे कैक्टस का फर्क भी
मुझे तुमने बताया था
अब ये सवाल ना करना कि
अक्सर मेरी कविताओं में झील
और तुम्हारी में रेत क्यूँ हुआ करती है !
तमाम शब्दों का बारूद में बदल जाना
अचानक नहीं होता
विश्वास के परखच्चे उड़कर
तुम्हारे आंगन में भी बिखरेंगे
तब बादलों से कुछ देर और बरसने की
गुज़ारिश न करना ....
बारिशों से तुम्हें यूँ भी नफरत है !
अगली कविता के जन्म से पहले
सारे मौसम धुंधला जायेंगे
तुम चाहो तो अभी से अपनी
यादों की पोटली संभाल के रख दो
अंधेरों से तुम्हें अब भी डर लगता होगा .
हो सके तो कुछ पुरानी मुलाकातें जला देना
कुछ तो नज़र आ ही जायेगा ....
कोशिश करती हूँ कि
आज और अभी जी लूँ बस ,
इतिहास बनते भला क्या देर लगती है ????

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