Thursday, 23 May 2013

स्वनिर्णय



एक एक शब्द से 
सौ नश्तरों की चुभन और 
तेजाब सी जलन का अहसास पाना 
हर स्त्री के नसीब में नहीं होता ---
देह के भीतर भी पत्थरों की कमी नहीं 
और बाहर  भी . 
हर चोट एक दूसरे से 
गुत्थम गुत्था हो कर शून्य हो जाती है 
ओर  क्या रह जाता है ....?
समर्पण की धज्जियाँ उडाता अट्टाहस  ......!
यह नियति नहीं -
कर्मरेखा या भाग्यफल भी नहीं ,
स्वनिर्णय होता है 
जो बार बार सिर्फ इस वज़ह से 
कमज़ोर पड़ता है कि 
अगली बार ऐसा नहीं होगा शायद ........! 
जंगलों में पेड़ अकेले नहीं होते 
परन्तु हर लता उनसे आकर लिपटती भी नहीं .
मैं गुलीवर के देश को नहीं जानती 
लेकिन घूरों पर उगते कुकुरमुत्ते 
अक्सर जंगलों में तब्दील नहीं होते 
और----
 उन बौने  जंगलों में
 तेजाब  से जले चेहरे वाली स्त्री 
अब नहीं उगती ......!!!

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