कुछ दिनों से
शब्द घेरे हैं मुझे चारों और से
कोलाहल सा मचाते ...!
.न तो उड़कर परे हटते हैं
न ही रचते कोई प्रेम कविता ..
तमाम कोशिशें करने पर भी
बिगड़ जाती है बार बार
शब्दों की तासीर
और कडवाहट टपकने लगती है
अनकहे बयानों से ....
.झील के किनारे चिपटे
भूरे हरे शैवालों सी
फिसलन भरे ये शब्द
लड़खड़ाते हुए वही आवाज़ देते हैं
जो पर्वत पार के मंदिर के घंटों में
अब भी गूंजती है .....!!!

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