Thursday, 16 May 2013

बस…यूँ ही तो


यादों की तलहटी से परावर्तित होकर 
अब मेरी आवाज़ अक्सर 
मुझ तक ही वापस पहुँच जाती है ....
शायद तुम्हें पीछे मुड़ कर देखने की 
आदत नहीं रही 
और मैं .....
कभी तुमसे आगे निकल न पाई !

तुम अब भी 
मुलाकातों के मुलम्मे चढ़ी यादों में 
बसर करते हो
जबकि मेरे लिए
तमाम उम्र का इंतजार भी काफी नहीं
बस…यूँ ही तो
कविताओं की बस्तियां उजडती हैं ---

रिश्तों का सौंधा कच्चापन छोड़ कर
तुम्हें तब्दीलियों का पथरीलापन
रास आने लगा है -
फिर भी मुझ में बस रहे 'तुम' को मैंने
तल्खियों की धूप से बचा रखा है .....
तुम जानते हो ना
पाँवों के निशान हमेशा
पगडंडियों पर ही उभरते है
कोलतार की सड़कों पर नहीं ??

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