लगता है मेरे भीतर
एक और दरवाजा है
खुलता - बंद होता
खडखड़Iता .धड धडाता-
उसकी एक झिरी से
सूरज के उलाहने आते हैं
और सायों की शक्ल में
घटते बढते रहते हैं ...
जब उनके खातों के
सारे जोड़ बाकी
ह्रदय के रक्त को उलीचते हैं
मेरी आँखों तक -
तो भरभरा के ढह जाता है
वह दरवाजा और
उघड जाता है रौशनी के दायरे में
समेटा हुआ एक कतरा अँधेरा .....

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