Saturday, 3 March 2012

पुनर्जन्म



फिर निर्वासित हुई एक नारी 
अपने ही संबंधों की 
भीड़ में से 
अभिशप्त कटी बेल सी --
मुक्त कर दी गयी वह 
सभी संबोधनों,
विशेषणों,
क्रियायों और 
प्रतिक्रियाओं से .....
अब फिर से करेगी वह 
शून्य से शुरुआत 
तौल कर पर अपने 
उड़ेगी निर्बाध -
आसमान से ओस की तरह 
निरंतर बरसते संदेह 
और प्रताड़ना के बीच 
अड़ी रहेगी 
निडर,निष्कलंक .....
तब भी 
आस पास बसे 
वृक्षों का झुरमुट 
बार बार यही 
फुसफुसायेगा 
लो, 
फिर मुखर हो गया एक स्वर -
कोलाहल के जंगल में........

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