फिर निर्वासित हुई एक नारी
अपने ही संबंधों की
भीड़ में से
अभिशप्त कटी बेल सी --
मुक्त कर दी गयी वह
सभी संबोधनों,
विशेषणों,
क्रियायों और
प्रतिक्रियाओं से .....
अब फिर से करेगी वह
शून्य से शुरुआत
तौल कर पर अपने
उड़ेगी निर्बाध -
आसमान से ओस की तरह
निरंतर बरसते संदेह
और प्रताड़ना के बीच
अड़ी रहेगी
निडर,निष्कलंक .....
तब भी
आस पास बसे
वृक्षों का झुरमुट
बार बार यही
फुसफुसायेगा
लो,
फिर मुखर हो गया एक स्वर -
कोलाहल के जंगल में........

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