उस रोज़ से
जब झील की एक लहर
किनारे को तोड़
बहा ले गयी थी
तुम्हारे पांवों की नमी ,
मैं आचमन कर रही हूँ
हवा में घुले विकिरणों के अलावा
प्रेम के वाष्प कणों का ---
पहाड़ों पर अपने हस्ताक्षर करती
संवेदनाओं की गंध
अब तक भी तुम तक
पहुँचने में अटकती है ,
लेकिन -
न जाने क्यों
तुम्हारे पांवों के निशान
अब भी किनारे की रेत पर
ताज़ा हैं ...........

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