Saturday, 3 March 2012

उस रोज़



उस रोज़ से 
जब झील की एक लहर 
किनारे को तोड़ 
बहा ले गयी थी 
तुम्हारे पांवों की नमी ,
मैं आचमन कर रही हूँ 
हवा में घुले विकिरणों के अलावा 
प्रेम के वाष्प कणों का ---
पहाड़ों पर अपने  हस्ताक्षर करती
संवेदनाओं की गंध 
अब तक भी तुम तक 
पहुँचने में अटकती है ,
लेकिन -
न जाने क्यों 
तुम्हारे पांवों के निशान 
अब भी किनारे की रेत पर 
ताज़ा हैं ........... 

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