Sunday, 26 April 2020

देखे बहुत मैंने मरुस्थल तपते
सूरज से अग्नि की बरसात होते देखी कितनी ही बार
देखा बहुत बार खौलता समुद्र भाप बनकर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
 पृथ्वी की पथरीली सतह तोड़कर बाहर निकलते -रेत, मिट्टी, पानी, हवा - सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर तक...
लेकिन कल रात स्वप्न में जब
तुम्हारी देह को छुआ
तब महसूस हुआ कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी कांची देह जितनी
न रेत, न मिट्टी, पानी न हवा
नहीं - कुछ नहीं तपता
तुम्हारी देह से ज़्यादा....!!

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