अब कोई सपना नहीं उगता -
ऐसा नहीं है कि बंजर हुआ है मन
खूब फूटते हैं अंकुर उम्मीदों के
शहर भर की दुआएँ भी साथ होतीं हैं,
कभी कभी बादल भर छींटे उछटते हैं आसपास
पर सपनों की शुरुआत तक कोई नहीं पहुँचता
एक कोना सुलगता ही रहता है...
धुआं-धुआं रिस कर हृदय की दरारों से,
पहुँचेगा ज़रूर तुम तक.
अक्सर -
ख़्वाहिशों की तबाही की वज़ह
चिंगारी ही नहीं,
घुटन भी बनती है...!
नीलम -
ऐसा नहीं है कि बंजर हुआ है मन
खूब फूटते हैं अंकुर उम्मीदों के
शहर भर की दुआएँ भी साथ होतीं हैं,
कभी कभी बादल भर छींटे उछटते हैं आसपास
पर सपनों की शुरुआत तक कोई नहीं पहुँचता
एक कोना सुलगता ही रहता है...
धुआं-धुआं रिस कर हृदय की दरारों से,
पहुँचेगा ज़रूर तुम तक.
अक्सर -
ख़्वाहिशों की तबाही की वज़ह
चिंगारी ही नहीं,
घुटन भी बनती है...!
नीलम -
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