Wednesday, 4 January 2023
ज़िंदगी
ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा है मैंने
साए को जिस्म से जुदा होते देखा है मैंने
अब तो एतबार शब्द का अर्थ ही समझ नहीं आता
क्योंकि अर्थों का अनर्थ होते देखा है मैंने
मैं तो चल पड़ी थी अपना लक्ष्य तय कर के
अचानक हवाओं को रुख बदलते देखा है मैंने
साए को क्या दोष दूँ, गर रोशनी ही साथ छोड़ दे
इसलिए अंधेरी रात में बैठकर यह कलाम लिखा है मैने
अगर ज़िंदगी मिली है तो जीना ही पड़ेगा
इसलिए रोना नहीं, हँसना अच्छे से सीखा है मैने
दुनिया में ज़ख्म देने वाले तो बहुत हैं
बहुत कम को मरहम लगाते देखा है मैंने
बातें तो दोस्ती में बड़ी बड़ी बनाते हैं लोग
बहुत कम को ही निभाते हुए देखा है मैंने
प्यार मोहब्बत रिश्ते नाते,रह गई कोरी ये तो बातें
हर शख़्स को मतलब का साथ निभाते देखा है मैंने....
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