आज फिर वही उगते सूरज की चहलकदमी के साथ
दौड़ -धूप भरा दिन ....
बार बार परे हटाती तुम्हारी यादों को
शाम के आखिरी छोर तक धकेल दिया -
उलझ उलझ के फिसल पड़ते तमाम दर्द
आज ऑंखें नम ही न कर पाए -
इर्द गिर्द उग आये दो -चार ख्वाबों के अधबुने जाले
दूर कहीं घसीट कर छिपा दिए -
एक दो मासूम हसरतों ने सर उठाया भी
तो कुछ गहरी सांसों से उन्हें तबाह कर दिया ....
उफ़!!इतना सब कुछ हुआ
पर ये मन .....!!!
ये मन स्त्री न हो पाया .....!!!
दौड़ -धूप भरा दिन ....
बार बार परे हटाती तुम्हारी यादों को
शाम के आखिरी छोर तक धकेल दिया -
उलझ उलझ के फिसल पड़ते तमाम दर्द
आज ऑंखें नम ही न कर पाए -
इर्द गिर्द उग आये दो -चार ख्वाबों के अधबुने जाले
दूर कहीं घसीट कर छिपा दिए -
एक दो मासूम हसरतों ने सर उठाया भी
तो कुछ गहरी सांसों से उन्हें तबाह कर दिया ....
उफ़!!इतना सब कुछ हुआ
पर ये मन .....!!!
ये मन स्त्री न हो पाया .....!!!
No comments:
Post a Comment