हमेशा यूँ कब हुआ कि तुम पहले अपनी पलकें झपकाते?
तेज़ रोशनी से मेरी भी आँखें चौंधियाँ जाती थीं ....
उस दिन भी दो- चार सितारे बाल्कनी में
और एक- दो चाँद आँगन में टंगे थे
मेरे शब्दों से पहले, मेरी सोच तुम तक पहुँच जाती है
यही हुआ -
तभी तो आहिस्ता से वो सब समेट कर
कमरे की छत पर बिखेर दिये तुमने ...
आज उन्हीं को घूरते हुये
तुम्हारे मोबाइल की रिंगटोन याद आ रही है मुझे
"इत्ती सी हँसी...इत्ती सी ख़ुशी...इत्ता सा टुकड़ा चाँद का
ख़्वाबों के तिनकों से चल बनाएँ आशियाना ..."
सच कहूँ ,अब सिर्फ़ बिल्डिंगों के नाम ही
"आशियाना " रह गए हैं
' घर जैसा ' सब चुकता जा रहा है
हरा रंग दीवारों में सिमट गया है
और आसमान टी.वी.स्क्रीन पर !
तभी तो घर नहीं बसाया तुमने
ख़ानाबदोश भी नही रहे पूरी तरह से ,
ज़िस्म पर चक्कत्तों की तरह
यहाँ वहाँ चिपके रहते हो कुछ दिन -
बर्फ़ की दीवारें ही बना पाते हो बस ...सूखी बर्फ़ !
नमी तक नहीं होती उनमें
तुम्हारी तो आँखें भी सूख गयी होंगी अब तक
लहू का पता नहीं ...शायद बहता ही होगा ...धीरे धीरे !
पर मुझे अभी भी इश्क़ है रोशनी से
चाँद-सूरज रोज़ तो नहीं आते
पर दिये की लौ को अब भी पकड़ लेती हूँ
आज भी धो पोंछ के सुखा आई आग को
तुम देखना ,इस बरस बादलों से भाप बरसेगी
और तुम्हारे लफ़्ज़ फिर से खौलने लगेंगे ......!!!
तेज़ रोशनी से मेरी भी आँखें चौंधियाँ जाती थीं ....
उस दिन भी दो- चार सितारे बाल्कनी में
और एक- दो चाँद आँगन में टंगे थे
मेरे शब्दों से पहले, मेरी सोच तुम तक पहुँच जाती है
यही हुआ -
तभी तो आहिस्ता से वो सब समेट कर
कमरे की छत पर बिखेर दिये तुमने ...
आज उन्हीं को घूरते हुये
तुम्हारे मोबाइल की रिंगटोन याद आ रही है मुझे
"इत्ती सी हँसी...इत्ती सी ख़ुशी...इत्ता सा टुकड़ा चाँद का
ख़्वाबों के तिनकों से चल बनाएँ आशियाना ..."
सच कहूँ ,अब सिर्फ़ बिल्डिंगों के नाम ही
"आशियाना " रह गए हैं
' घर जैसा ' सब चुकता जा रहा है
हरा रंग दीवारों में सिमट गया है
और आसमान टी.वी.स्क्रीन पर !
तभी तो घर नहीं बसाया तुमने
ख़ानाबदोश भी नही रहे पूरी तरह से ,
ज़िस्म पर चक्कत्तों की तरह
यहाँ वहाँ चिपके रहते हो कुछ दिन -
बर्फ़ की दीवारें ही बना पाते हो बस ...सूखी बर्फ़ !
नमी तक नहीं होती उनमें
तुम्हारी तो आँखें भी सूख गयी होंगी अब तक
लहू का पता नहीं ...शायद बहता ही होगा ...धीरे धीरे !
पर मुझे अभी भी इश्क़ है रोशनी से
चाँद-सूरज रोज़ तो नहीं आते
पर दिये की लौ को अब भी पकड़ लेती हूँ
आज भी धो पोंछ के सुखा आई आग को
तुम देखना ,इस बरस बादलों से भाप बरसेगी
और तुम्हारे लफ़्ज़ फिर से खौलने लगेंगे ......!!!
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