अनगिनत ख्वाहिशें अंकुराती रहीं
यादों की गीली मिटटी में,
ओस में भीगी घास की नमी भी चुरा ली
बेरहम सपनों ने-
और अब दुआ कर रहे हैं
उस गली में बरसने की
जहाँ सितारों की छाँव में पलती हैं
तुम्हारी तमाम कोशिशें ,
अंधेरों को सूरज बना देने की.......
मैंने भी आज
बादलों के पांवों में घुँघरू बांध दिए हैं
और रात भर नींद से
जद्दोज़हद करती रही.......!
यादों की गीली मिटटी में,
ओस में भीगी घास की नमी भी चुरा ली
बेरहम सपनों ने-
और अब दुआ कर रहे हैं
उस गली में बरसने की
जहाँ सितारों की छाँव में पलती हैं
तुम्हारी तमाम कोशिशें ,
अंधेरों को सूरज बना देने की.......
मैंने भी आज
बादलों के पांवों में घुँघरू बांध दिए हैं
और रात भर नींद से
जद्दोज़हद करती रही.......!
No comments:
Post a Comment