जाने क्यूँ आधा-अधूरा सा दर्द ही
आता है मेरे हिस्से में ?
बाकी किसे बाँट आते हो?
तलाशा मैंने उसे
तुम्हारी किताबों और दराजों में
तुम्हारी नज्मों की
अलिखित पंक्तियों में भी
बंद खिड़की की दरारों से झांकती
रौशनी की लकीरों में
यहाँ तक कि
होठों तक आ कर रुक गए
तुम्हारे अनकहे शब्दों में भी ---
कहीं नहीं मिला ,
कभी नहीं मिला -
हथेली के नम हो जाने तक
लिखते रहे तुम
उन सभी दर्दों को
कभी ग़ज़ल ,कभी कविता
तो कभी गीत बनकर
बिखेरते रहे चारों तरफ --
एक कतरा भर बच गया होगा
लिखने से
वही पहुंचा मुझ तक
आधा अधूरा सा दर्द ...
इसे कैसे करूँ पूरा
कि वापस न जा पाए तुम तक
मेरा ही हो कर रह जाये
यह भरा पूरा सा दर्द
और रह जाये तुम्हारे आस -पास
बिना किसी दर्द के जीने का अहसास
हमेशा -हमेशा ..........

...वाह क्या बात है !!!!!
ReplyDeletethanx....
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