Sunday, 15 April 2012

अब भी ताकता है




अब भी ताकता है आसमान
धूप और बादल की गुफ्तगू से बनी
तुम्हारी धुंधली सी तस्वीर को एकटक ...
न जाने कब एक गुनगुनी बूँद
तुम्हारी कोई बात मेरी हथेली में
छम से थमा जाये -
और मैं झुलसती रहूँ ताउम्र
पसीजते मौसम को बददुआएं देती
हवाओं को पलट कर न देखने की
कसमें देती और-
मुठ्ठी की कसमसाहट में दम तोडती
तुम्हारी उस आखिरी बात पर
अपने वजूद को नकारने की कोशिश करती
गुनगुनी बूँद की पैदाइश को ....
सौ सौ सूरजों की तपिश झेल कर
अब भी उगना चाहती हूँ
उसी रेगिस्तान की बंज़र ज़मीन पे
जहाँ रख दी थी हथेली अपनी
देख कर छले तुम्हारे पाँव के ....

2 comments:

  1. नीलम जी, हमेशा हतप्रभ कर देती हैं, जाने कहाँ से लाती हैं ये सोच?

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  2. yah samarpan kee parakashtha hai Neelam jee , khud ko tamam tarah kee vedna ,peeda air kathinayiyon se ru - ba - ru kara kar ,swayam ke mitne kee chah kisi kee chahana mein .wah ,adbhut rachna Neelam jee . dil bhar aaya . aap safal huyee hain yahan apnee chinta ,fikramandi ko shashwat jijivisha ka roop dene mein ,bahut badhayee Neelam jee .

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