Thursday, 15 November 2012


जब सन्नाटों की चीखें गूंगी हो जाएँ
और खामोशियों की खेती करने का ख्याल सर उठाये ,
तब तक सहेजी हुई स्मृतियों का गीलापन
बार बार कडवे अहसासों को भिगोकर
अंकुरित कर देता है ...
और तमाम ख्यालों के हकीकत बनने तक
मौन की फसल लहलहा उठती है---!
       
उस आग के बारे में मत सोचो
न ही उस राख की बातें करो
जो कविता की तपिश को बाहर लाने की बजाय
भीतर ही भीतर सुलगता छोड़ देती है
और चंद फुहारों के इंतजार में
वह खुद को अर्थहीन बना देती है .....!
ऐसी बेमकसद कविताओं के गूंगेपन पर
कोई शर्मिंदा नहीं होता -
न ही किसी कविता को
एक खूबसूरत ग़ज़ल में तब्दील करने के लिए
अक्षरों को सहलाना, मनाना ज़रूरी होता है !

मैं जानती हूँ
उन ढेर सारे  रंगों से मेरा अब कोई वास्ता नहीं
जिनके लिए हमेशा मेरी बिंदिया मुस्कराती थी ....
रंगों का खुद में सिमट कर
एक पीला मटमैला सा असर डालना
मेरी तबियत को अब
ज्यादा हरा कर देता है .......!!!!

1 comment:

  1. उस आग के बारे में मत सोचो
    न ही उस राख की बातें करो
    जो कविता की तपिश को बाहर लाने की बजाय
    भीतर ही भीतर सुलगता छोड़ देती है
    और चंद फुहारों के इंतजार में
    वह खुद को अर्थहीन बना देती है .....

    Wah Sachmuch Adbhut......Badhai...

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