Saturday, 14 June 2014

ये शहर शिनाख़्त नहीं करता किसी की ---!
तमाम तर्ज़नियाँ थक जातीं हैं दिशा बताते बताते ,
धुंध बादल बनने से पहले ही छितरा जाती है ,
सड़कें सरकती सी पहुँचातीं हैं गंतव्य तक ,
और -
ख़ुश्क मिजाज़ लोग तलाशते हैं रिश्तों में नमी … !
सुनो -
बारिशें छोड़े जा रही हूँ तुम्हारे तमतमाते शहर में !!!
थामे रखना दो बूँदें अपनी पसीजती हथेली में
कलम के साथ साथ…
अगली बार भीगती भिगोती आऊँगी
सावन के हरेपन में सौंधी महक बिखेरने
तब खोल देना अपनी बंद मुठ्ठी
और बहा देना ये दो बूँदें
बरसती बौछारों की गोद  में !
चाहो तो चख लेना उन्हें
बहुत खारी-सी लगेंगी …
आखिर तुम्हारी कलम से निकला तमाम नमक
समंदर तक थोड़े ही पहुँचता है !!!!

4 comments:

  1. सुनो -
    बारिशें छोड़े जा रही हूँ तुम्हारे तमतमाते शहर में !!!
    थामे रखना दो बूँदें अपनी पसीजती हथेली में
    amazing feelings... speechless.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  3. शुक्रिया संजय भास्कर जी

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  4. धन्यवाद मनोज ...!

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