आदतें बचपन से ही डाली जानी चाहिए -
चुप रहना सीख लो लड़कियों!
तुम्हारी माँएं आधी हो जातीं हैं दहशत से
जब लौटती हो घर तुम
रात आठ बजे के बाद -
कल्पना में कई बार उभरती है निर्भया उनके
निर्वस्त्र, लहूलुहान
और भींच लेतीं हैं वे अपनी
आँसू भरी आंखें ज़ोर से
कि खारे हो जाते हैं बर्तन
या बिगड़ जाता है दाल - सब्ज़ी का स्वाद!
क्या उखाड़ लोगी चीख चीख कर तुम?
सिर्फ़ छुआ ही गया न तुम्हें
तुम्हारी मर्ज़ी के ख़िलाफ़??
यह तो दोहराया जाएगा अक्सर, बार - बार
तब भी - जब ब्याह दी जाओगी
अपनी पसंद - नापसंद के घरों में.
ये मत समझ लेना कि चारदीवारी में सुरक्षित रहोगी तुम-
भेड़िये रिश्ते नहीं समझते, मेरी बच्चियों!!
हाँ, देवी बनी रहोगी तुम प्रस्तर अट्टालिकाओं में
पर वास्तविकता सदैव परे ही रहेगी इस भ्रम से !
लोग चरण - पूजन के समय भी
निहारेंगे तुम्हारी कोमल पिंडलियाँ
या दबा देंगे निर्लज्जता से तुम्हारे नन्हें हाथ
भेंट के सिक्के रखते समय....
चुप ही रहोगी न तुम.. तब भी???
घुटने, दबने और सहने की आदतें
बचपन से ही डाली जानी चाहिए
माताओं!! सुन रही हो न तुम ?
तुम्हारे दिन तो पूरे हुए अब
इन लड़कियों की साँसें, खिलखिलाहटें, अदाएं
सब जमा कर इकट्ठी करती जाओ
उस जंग लगे संदूक में
जहाँ तुम्हारी दादी सास की गोटे किनारी वाली ओढ़नी रखी है
वक़्त आने पर वही काम आएगी
देह के धूल हो जाने पर ..
तभी विसर्जित कर देना
उन साँसों, खिलखिलाहटों और मासूम अदाओं को भी
जो दब - घुट कर आख़िर में
एक आह भर रह जाएंगी....! !
चुप रहना सीख लो लड़कियों!
तुम्हारी माँएं आधी हो जातीं हैं दहशत से
जब लौटती हो घर तुम
रात आठ बजे के बाद -
कल्पना में कई बार उभरती है निर्भया उनके
निर्वस्त्र, लहूलुहान
और भींच लेतीं हैं वे अपनी
आँसू भरी आंखें ज़ोर से
कि खारे हो जाते हैं बर्तन
या बिगड़ जाता है दाल - सब्ज़ी का स्वाद!
क्या उखाड़ लोगी चीख चीख कर तुम?
सिर्फ़ छुआ ही गया न तुम्हें
तुम्हारी मर्ज़ी के ख़िलाफ़??
यह तो दोहराया जाएगा अक्सर, बार - बार
तब भी - जब ब्याह दी जाओगी
अपनी पसंद - नापसंद के घरों में.
ये मत समझ लेना कि चारदीवारी में सुरक्षित रहोगी तुम-
भेड़िये रिश्ते नहीं समझते, मेरी बच्चियों!!
हाँ, देवी बनी रहोगी तुम प्रस्तर अट्टालिकाओं में
पर वास्तविकता सदैव परे ही रहेगी इस भ्रम से !
लोग चरण - पूजन के समय भी
निहारेंगे तुम्हारी कोमल पिंडलियाँ
या दबा देंगे निर्लज्जता से तुम्हारे नन्हें हाथ
भेंट के सिक्के रखते समय....
चुप ही रहोगी न तुम.. तब भी???
घुटने, दबने और सहने की आदतें
बचपन से ही डाली जानी चाहिए
माताओं!! सुन रही हो न तुम ?
तुम्हारे दिन तो पूरे हुए अब
इन लड़कियों की साँसें, खिलखिलाहटें, अदाएं
सब जमा कर इकट्ठी करती जाओ
उस जंग लगे संदूक में
जहाँ तुम्हारी दादी सास की गोटे किनारी वाली ओढ़नी रखी है
वक़्त आने पर वही काम आएगी
देह के धूल हो जाने पर ..
तभी विसर्जित कर देना
उन साँसों, खिलखिलाहटों और मासूम अदाओं को भी
जो दब - घुट कर आख़िर में
एक आह भर रह जाएंगी....! !
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