Thursday, 17 November 2011



मैं उस दिन का इंतजार करुँगी 
जब तुम्हारी हथेलियों से छन कर आती धूप 
उतरेगी मेरे चेहरे पर 
और उनींदी आंखे खोलने पर 
देखूंगी तुम्हारे भीगे बालों से टपकती बूंदों को .

हो सकता है तब तक 
तुम इतने बदल जाओ 
कि नाम तक भुला दो मेरा 
और पूछो अचकचा कर 
कौन हो तुम ???

तब में अगले पिछले सारे वादों की
ओढ़नी समेट कर रख दूँगी 
और फिर से तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर 
एक झीने से आवरण में बुन कर 
इस तरह डाल दूँगी तुम्हारे अनमने भावों पर 
कि तुम उनकी पारदर्शिता में 
कुछ न छिपा पाओगे मुझसे ...

कौन नहीं जानता कि बादल, हवा जरुरी है सबके लिए ?
रेत में बनते -बिगड़ते आकारों को
 हमेशा गिनते रहना बेमकसद है ?
या पेड़ पर लगे पत्ते झरने से पहले 
ज़रा-सा कंपकपाते हैं ?

फिर भी इन सवालों के घिसे -पिटे जवाब 
मिलेंगे तुम्हें बार बार 
लगातार !
इसलिए नहीं कि मेरे उत्तर 
तुम्हारे अनमनेपन को बेगाना कर देंगे -
बल्कि इसलिए कि 
तुहारे प्रश्नों के जुड़ने -घटने से ही 
मैं अपनी ज़िन्दगी के गणित के सारे प्रमेय 
सरलता से समझ पाती हूँ ........

4 comments:

  1. वाह...बहुत खुबसूरत.
    एक बात बताओ...1 + 1 = ??

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  2. ....कुछ भी कहा जा सकता है.
    ग्यारह भी... दो भी.
    ....लेकिन यह एक गणितीय व्यवस्था है.
    हकीकत तो यह है कि एक में एक जोड़ने पर एक ही रहेगा.
    क्या मैं गलत कह रहा हूँ...??

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  3. बहुत ही सुन्दर.......खुद के एहसास हैं...खुद ही के झंझावत और प्रश्नों का मायावी जंजाल....

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