जब जब जनमती है तुम्हारी कविता
मेरी कोख की पीड़ा हरी हो जाती है -
सारी संवेदनाएं उथल -पुथल मचाती हुई
ह्रदय से उँगलियों तक का सफ़र
तय कर लेती हैं और
कागज की छट पटाहट
कुछ देर के लिए ही सही -
शांत हो जाती है
. मगर हमेशा ऐसा नहीं होता -
कई बार समेटे ही नहीं जाते शब्द ...
ऐसे में बिखर -बिखर जाती हैं पीडाएं
यहाँ -वहां ,
अधूरे भ्रूण सी ,
अपने होने ,न होने को कोसती
सूने -सपाट सन्नाटों से बतियाती ...
उलहानों का इतिहास बनाती.
सुनो ---
उँगलियों और कलम का अंतर
तुम्हारे शब्द समझते होंगे ,
मेरे नहीं-

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