Friday, 6 January 2012

जब जब जनमती है तुम्हारी कविता



जब जब जनमती है तुम्हारी कविता 
मेरी कोख की पीड़ा हरी हो जाती है -
सारी संवेदनाएं उथल -पुथल मचाती हुई 
ह्रदय से उँगलियों तक का सफ़र 
तय कर लेती हैं और 
कागज की छट पटाहट
कुछ देर के लिए ही सही -
शांत हो जाती है
.           मगर हमेशा ऐसा नहीं होता -
            कई बार समेटे ही नहीं जाते शब्द ...
            ऐसे में बिखर -बिखर जाती हैं पीडाएं 
           यहाँ -वहां ,
           अधूरे भ्रूण सी ,
           अपने होने ,न होने को कोसती 
           सूने -सपाट सन्नाटों से बतियाती ...
          उलहानों का इतिहास बनाती.
सुनो ---
उँगलियों और कलम का अंतर 
तुम्हारे शब्द समझते होंगे ,
मेरे नहीं-

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