Sunday, 22 April 2012



जब भी उखाड़ फेंकते हो मुझे तुम 
अपने जीवन की हरी भरी ज़मीन से 
आस पास उगे खरपतवार की तरह -
मेरी संवेदनाओं की कंटीली झाड़ियाँ 
तुनक कर और भी तीखी हो जाती हैं...
मिटटी का सारा कच्चापन ,सौंधापन 
तड़कने लगता है ,
नुकीले शब्दों की जड़ों के बिंधने से -
बादलों के कहकहे भी
मुस्कराहटों के फूल खिला नहीं पाते
और जमती जाती है
अवसाद की परत दर परत
समूचे अस्तित्व के कोने कोने पर -
एक अदद ताज़ा हवा के इंतजार में
कितने ज़नम गुज़ारूँ मैं ???

1 comment:

  1. apne astitwa kee talash ,apnee jadon ko aur gahre karnee kee jaddo-jahad .kayee samikaran saath me tay karte hain jindagi ki ees bechaini ko , bahut achchhi abhivyakti Neelam ji . :)

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