Saturday, 2 July 2011

तुमसे मिलना

                      
जब भी चिलचिलाती धूप से बचने को 
फैलाओगे अपनी हथेलियाँ 
मुझे पाओगे अपनी अँगुलियों के 
पोरों के बीच में .
अपनी आँखों को भिगोना 
पानी के छींटों से और 
महसूस करना उन बूंदों को 
अपने चेहरे पर 
जिन्हें मैं यूँ ही बहता छोड़ आयी थी .
        हवा के झ्होंकों की अंगुली पकड़ कर 
        रास्ते बनाये थे मैंने 
        बादलों के गुस्से से बेपरवाह 
       भीगते हुए 
        तितलियों के पीछे पीछे भागी थी 
       कुछ दूर चल लेना वहां तक 
       बेमकसद ...
अगली बार तलाशुंगी
 तुम्हारे क़दमों के निशान 
उस झ्हरने के पास ,
पहाड़ की तलहटी में 
और जंगल के दरख्तों के बीच 
जहाँ रुक कर तुमने कुछ देर 
ताज़ी हवा भरी होगी अपनी सांसों में 
और लिया होगा मेरा नाम 
कई बार अपने होठों से ...
        लगता है हम यूँ ही मिलते रहेंगे 
        इन वादियों में हमेशा 
        एक साथ नहीं-
         एक के बाद एक 
        जुदा जुदा सा होगा ये मिलना 
        तुमसे तुम्हारे बाद----

2 comments:

  1. जुदा जुदा सा होगा ये मिलना
    तुमसे तुम्हारे बाद.....
    kya baat कही है medam... vaah.
    पहली बार ही आपको पढ़ा है..अच्छा लिखते हो.

    ...लगता है...कहीं कुछ छूट गया है...
    ...यादों की तितलियों के पंखों का रंग अँगुलियों के पोरों पर है...मगर तितलियाँ...

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  2. जुदा जुदा सा होगा ये मिलना
    तुमसे तुम्हारे बाद.....
    kya baat कही है medam... vaah.
    पहली बार ही आपको पढ़ा है..अच्छा लिखते हो.
    ...लगता है...कहीं कुछ छूट गया है...
    ...यादों की तितलियों के पंखों का रंग अँगुलियों के पोरों पर है...मगर तितलियाँ...

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