Saturday, 19 November 2011

कुछ कहे बिना



कुछ कहे बिना 
समझते समझते 
आखिरी सन्नाटे ने भी 
मुंह फेर लिया ,
सारा मौन मिल कर 
चीखने लगा और
शोर में दबी सिसकियों ने
घर छोड़ने से पहले
पता भी न पूछा मेरे मोहल्ले का ....
अब भी उन चुप्पियों का तीखापन
हवा में घुल कर
तलाश रहा है
मेरे मन के कोनों में छिपी
सीली सीली सी सुलगन को -
जलाने या बुझाने के लिए ....

1 comment:

  1. सच कहूँ तो शब्दों की कमी पड़ गयी है यहाँ....क्या लिखूं कैसे लिखूं...कुछ समझ में ही नहीं आ रहा..
    मेरे मन के कोनों में छिपी
    सीली सीली सी सुलगन को -
    जलाने या बुझाने के लिए ....

    कुहासे की ये अगन कुछ अजीब सा ही एहसास जगाने लगी है....तो शब्दों को धुन्धने के लिए...

    हवा में घुल कर
    तलाश रहा है

    मेरी दबी दबी सी सिसकियाँ.......

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