Thursday, 17 May 2012

काश! तुम स्त्री होते



काश! तुम स्त्री होते 
और समझते, 
महसूस करते उस पीड़ा को 
जो तुम हमें रोजाना देते हो, हर पल -
घरों ,चौराहों ,दफ्तरों और एकांत में.
तुम देखते 
अपनी ही आँखों से लुटते हुए 
अपना सर्वस्व 
छोटी छोटी बातों पर. 
तुम देखते मेरे समर्पण को 
और तौलते अपने अहंकार को 
मेरे विश्वास और अपने विश्वासघात के 
तराजू पर.
तुम समझते रिश्तों के यथार्थ को 
जिसे निभाते निभाते 
मैं आखिरी साँस तक 
भूल जाती हूँ अपना अस्तित्व ,
और देखने लगती हूँ 
तुम्हारे अस्तित्व के दर्पण में 
स्वयं को.
मगर तब मैं कहाँ होती हूँ???
जिधर देखती हूँ सिर्फ तुम ही तुम होते हो
मेरा अतीत,वर्तमान-भविष्य 
और तुमसे लिपटा मेरा अनंत भी.
अच्छा अब मान भी जाओ 
और एक पल को स्त्री बन कर देखो
नागों से लिपटे चन्दन की तरह....
अरे!तुम तो कल्पना भर से ही सिहर गए?
चलो जाने दो!
सत्य ,काल की सीमाओं से परे 
मेरा स्त्री बने रहना ही
तुम्हारे पुरुष होने को
परिभाषित करता रहेगा....!


1 comment:

  1. stree hone kee peeda ko bahut hee prabhavi tarike se varnit kiya hai apne Neelam ji ,apne stree vimarsh ko ek naya aayam diya hai apne ees kavita ke madhyam se . achchhi rachna mam ,meri badhai sweekar karein .

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