पिछले दो बरसों में
कितनी ही बारिशें हुयीं
तमाम झीलें लबालब भरीं
लाल -पीले फूलों से वादियाँ महकीं
पर -मैं न भीगी …
एक बार भी
न मन भीगा न तन ....!
यूँ सब कुछ वैसा ही है
हरा -भरा ,नम सा -
मिटटी पे एक गीला हाथ फिरा दिया हो जैसे
कहीं कुछ सूख कर तड़का नहीं अब तक !
मुमकिन है
अगले दो बरस या उससे ज्यादा भी
ऐसा ही रहे ....
भीतर तक झाँकने की
जुर्रत नहीं की मैंने ....
क्या पता कहीं कोई सूखा ,पपडीदार
ज़ख्म रिस रहा हो
कुरेदे जाने के इंतजार में
नासूर बन जाने तक
खामोश ---
अलहदा ---!!!

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