Wednesday, 25 May 2011

तुम्हारी नदी में


तुम्हारी मछलियों से की थी बातें मैंने
बूंदों पर उडती
धारों पर चढ़ती उतरती रंगीन मछलियाँ
अद्भुत अनोखे अनगिनत  आकार वाली मछलियाँ ...
      कहा था मैंने कि रंग तो मुझमें भी समाये हैं
      लगभग सारे ही -
      पर न जाने क्यों
      एक दूसरे में
     गड्ड-मड्ड हुए रहते हैं
     तुम जैसी रंगत दे नहीं पाते मुझे
     बस ,भीतर ही भीतर
     टकराते रहते हैं एक -दूसरे से
     ठोस पथरीले टुकड़ों क़ी तरह
     क्या इसलिए क़ि उन्हें
     किसी की रोम -रोम की पुलक ने
     नहीं जन्मा है ?
तुम्हारी मछलियों ने जवाब दिया -
शायद तुम्हारे रंगों को
इंतज़ार है अभी भी
किसी की द्रव्यता का
जिसमे घुल मिल कर
वे कर सकें तुम्हारी रंगत को भी
हम जैसा ही ....

1 comment:

  1. ...बहुत ही कड़वा सच

    खुबसूरत अभिव्यक्ति.

    ...मन को उदास कर देती है.

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