Thursday, 19 June 2025

कल साँझ कितनी उदास थी बेचैन, ख़ामोश और खोई खोई सी आज का सूरज भी मलिन और क्लान्त हवा भी एकदम शान्त थी मानो धैर्य की प्रतिमूर्ति हो! चिडियों के कलरव में कहां थी चहक और मस्ती? आज ही खिला था एक मुरझाया सा गुलाब न जाने कहां गई उसकी ताज़गी? सब ओर व्याप्त है सूनापन, रीती झीलों और बाँझ खलिहानों में भी। क्या सभी को प्रतीक्षा है तुम्हारी मेरी ही तरह? ओ सावन.....

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