Thursday, 19 June 2025

माँ, जंगल क्या होता है?

रखना सहेज कर सुरक्षित कहीं ये निशानियाँ, तस्वीरें और स्मृतियां वृक्षों की, फूलों की, झरनों की, क्योंकि पूछेगी आने वाली पीढ़ी कभी ’माँ, जंगल क्या होता है?’ अनजान हैं कितने ही उस नाज़ुक,मुलायम मखमली जान से जो सिमट जाती थी लाज से, एक स्पर्श मात्र की। आज कहाँ है वो वीर बहूटी? सावन,जो है अभी तो हरा हरा हो जाएगा तब मैला मैला सा और बेटियां पूछेंगी अर्थ तुमसे तीज,मेले और झूलों का। ढूंढोगी फिर उन चिन्हों को जो भरोसा दिल सकें कि जिया था कभी सावन तुमने भी ओढ़ लहरिया, मेंहदी रचे हाथों से। इसीलिए चाहूंगी कि समेट लो कहीं वादियों की हरियाली, झूलों की मस्ती, मेंहदी की लाली, घेवरों की महक और उस रक्ताभ मखमली ’सावन की डोकरी ’ को। सजा लो, छुपा लो, संजो लो ये सब ताकि... प्रत्युत्तर हो तुम्हारे पास इस चीत्कार करते सवाल का कि ’माँ, जंगल क्या होता है?’

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