कैसे जी लेते हो यूँ नीलकंठ बन के तुम ?
एक बार उगल दो ये सारा ज़हर .....
क्या हुआ जो बसंत नीला हो जायेगा !!!
और सुनो ,
मेरे लिए मौसमों की फेहरिस्त
इतनी लम्बी नहीं-
पतझड़ के बाद कोई मौसम
आता ही नहीं .......!
एक बार उगल दो ये सारा ज़हर .....
क्या हुआ जो बसंत नीला हो जायेगा !!!
और सुनो ,
मेरे लिए मौसमों की फेहरिस्त
इतनी लम्बी नहीं-
पतझड़ के बाद कोई मौसम
आता ही नहीं .......!
कब तक बना रहता नीलकंठ,
ReplyDeleteउगल दिया बरसों से गटका हुआ जहर,
तुम ही तो कहती थी,
"एक बार उगल दो ये सारा ज़हर"
और देखो बसंत नीला नहीं हुआ,
और ना ही पतझड़,
तुम्हारे पैरों के पास सिमटा,
बल्कि जहर के उगलने से जन्मा त्राहि,
तुम्हे भी निगल गया,
और अब मैं खोजता फिरता हूँ,
तुम्हारे पैरों के निशान,
जहाँ पतझड़ इकठ्ठा हुआ था,
हाँ वहीँ जहाँ टेसू लहक कर जल उठा था,
और मेरा सारा जहर,
तुमने लील लिया था,
अब मौसम नहीं बदलता,
और ना ही बरसता है सावन,
ना ही आसमान नीला होता है,
और ना ही गुलमोहर तुम्हारे आने पर कोयल सा कूक उठता है,
बस पसरा हुआ है सन्नाटा,
वही सन्नाटा जो प्रलय के लय में तुम्हारे जाने पर पिघल गया था,
क्यूंकि तुम पी गयी प्रलय को,
और टेसू और कनेर दहकते रहते हैं,
तुम्हारे गीत गाते हुए,
और मैं अपना खाली कंठ लेकर,
भटक रहा हूँ,
तुम्हारे इंतज़ार में,
की जमीं हुई बर्फ पिघलेगी ,
और कुछ नम कतरे,
सूख जायेंगे तुम्हारी यादों के धुप में,
औए मैं बह निकलूंगा फिर से,
टेसू से टपकते लावे में,
कनेर का पीलापन लिए,
सुन रही हो ना तुम,
नहीं भी सुन रही तो सुन लो,
अब मैं गुमशुदगी नहीं झेल सकता,
और ना ही बंद कमरे की उस आग में,
बाहर दहकते टेसू को जलते हुए छोड़ सकता हूँ.
- नीरज